- रविवार का बेसब्री से इंतजार रहता था क्योंकिं हमे वो सब उसी दिन करना था जो हम करना चाहते थे.....जूनियर g शक्तिमान,आर्यमन,कैप्टन व्योम,अलिफ लैला और ना जाने क्या क्या था उस बचपन मे .... भरी दोहपहरी मैं क्रिकेट खेलना शर्त होती थी 1 रुपये की पेप्सी की वो बर्फ के गोले वो मावे की कुल्फी वो 5 रुपये वाली लस्सी और वो भजिया झलेबी रात होने पर लाइट चले जाने पर गली मोहल्लले मैं छुपन छुपाई खेलना....वा वा शानदार दिन का

अंत इसी चीज से होता था ....स्कूल जाने पर होमवर्क नही होता था तो उस पीरियड से ही गायब हो जाना और ना जाने क्या क्या....ऐसी ऐसी चीजें थी जिसको हम सही मान लेते थे जैसे आकड़े के दूध और पेंसिल के बुरादे को साथ मैं मिला ने से रबड़ बन जाता है और विद्या माता को किताब के बीच मैं रखने से पास हो जाते है सनथ जयसूर्या के बैट मैं स्प्रिंग थी सिद्ध ने वो बैट तोड़ा ना जाने किस दुनिया में जीते थे गेम थे चुइंगम आयी थी उस समय बिग बोबल और बूमर उनके साथ पहली बार हमने टैटू देखे थे उनका अलग ही क्रेज था और प्लेइंग क्रिकेट कार्ड और माचिस की डिबिया फाड के उसके छाप का कॉलेक्शन करना कितना काम था हमारे पास बहुत व्यस्त शेड्यूल था....जेब मे बैर भर कर ले जाना कच्ची इमली का रास्ते चलते पेड़ पर पत्थर मार कर युही तोड़ लेना याद तो है वो दिन आपको.......कच्चे आमो को पेड़ से तोड़ लेना और ना जाने क्या क्या हर स्कूल मे एक टीचर यसा होता ही था जो सबका बहुत खयाल रखता था जिसे हम जिंदगी भर नही भूल पाते कितने यादों के समंदर है बस साहिल पार करते करते बहुत कुछ पीछे छूट जाते है.......1 रुपये के 25 मीठी मीठी गोलियां 1 रुपये के 32 कंचे क्या क्या आ जाता था उस 1 रुपये मैं आज सब कुछ है सब कुछ है पर वो दिन इतने अनमोल और अछे है कि बस याद करते ही दिल मे तरंगे दौड़ जाती है....त्यौहार सबके थे होली दीवाली ईद रमजान सब मिल जुलकर बना ते पता नही अचानक सब मैं इतनी नफरते कहा आ गयी कि सब कुछ कई पीछे छूट गया ....7 दिन की सर्दियों की छुटियाँ और 2 महीने की गर्मी की
छुटियाँ मतलब नानी के घर जाना ......."के कोई तो मिलाए मुझे वापस उस बीते हुए बचपन के दिनों से के मेरा युही फिर से बेवजह मुस्कुराने का मन है"......to be continued
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