बचपन के दिन और उसकी यादे पार्ट 4

बचपन की यादें जब कभी याद आती हैं आँखें नाम कर जाती हैं| वो दिन ऐसे होते हैं जो हर कोई चाहता हैं की लौट के आजायें | दोस्तों वो दिन लौट कर वापिस तो नहीं आ सकते पर कोशिश तो जारी है आपको उससे रूबरू करवाने की....बचपन भी कमाल का था खेलते खेलते चाह कही भी सोयें पर आँख मा के आंचल के बिस्तर पर ही खुलती थी !!
क्या दिन थे यार साईकल तक किराए पर ले कर चलाते थे ......कॉमिक्स हुआ करती थी वो भी रेंट पे मिलती थी चाचा चौधरी,नागराज,पिंकी,बबलू,मोटू पतलू ना जाने क्या क्या करेक्टर थे वो भी....उसके बाद जगह ली वीडियो गेम ने वो एक नई क्रांति ले कर आया था हमारे लिए उसमे मारियो,आइस लेंडर, टैंक,रॉड रेस,गलैक्सि,बूमर मैन और कॉण्ट्रा को कौन भूल सकता है ये दुनिया थी ना सबसे हसीन दुनिया थी हम लोगो की जो चाहकर भी नही जा सकती है यादों से .........टायर को लकड़ी से मार कर टायर गुमाना रोटी का पता नही बस दूध की ग्लास काफी थी रिचार्ज के लिए सब कुछ इतना हसीन था के अब ये लगता है के बचपन से निकले क्यो......सुकून की बात मत कर ऐ मेेरे यार बचपन वाला रविवार अब नहीं आता....चले आओ कभी टूटी हुई चूड़ी के टुकड़े से, वो बचपन की तरह फिर से मोहब्बत नाप लेते हैं..😊😊
To be continued

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