बचपन के दिन और उसकी यादे
आज की भागदौड़ डिजिटल जिंदगी मैं हम बहुत कुछ पीछे छोड़ के आ गए है शायद हम तकनीकी के सहारे रिश्तेदारों के करीब तो आ गए है पर करीब आने के साथ बहुत कुछ पीछे छोड़ दिया है.....याद है आप लोगो को वो 90's का जमाना शायद अभी वाली पीढी को नही मालूम होगा पर मैं चाहता हु की हमारे बच्चे जाने के मोबाइल से ज्यादा डिजिटल वर्ल्ड से ज्यादा रोमांचक हमारा बचपन हुआ करता था क्या दिन थे "ना किसी का डर था ना किसी से दुश्मनी ना किसी से बैर" बड़ी बड़ी बातें आती है नही बस इतना पता है साथ मैं अपने दोस्त थे अपना बचपन था त्यौहार भी सबके एक थे ....स्कूल मे 1st टाइम शायद डांट लगा के भेजा होगा लगभग सभी को 8 पीरियड 6 घण्टे और बीच मैं खाने के लिए जो छूटी होती थी उसमें शायद सबका टिफिन एक दूसरे से शेयर होता था....स्कूल से आने के बाद स्कूल बैग को साइड मैं फेंका और हम निकल जाते थे उस रोमांचक दुनिया मे जिसमे केवल हम ही राजा होते थे सब अपने आप मैं ....बैट जिसका वो बलेबाजी करेगा और टीम का कप्तान वो होगा जो बॉल लाएगा वो गेंदबाजी करेगा और गलती से अगर बलेबाज जिसका बल्ला है अगर वो पहली बॉल पे आउट हो गया तो मैच वही खत्म क्या वो मजा अब हम मिस कर रहे है.... गर्मियों मैं 2 टाइम नहाना रात होते ही गर्मियों के समय छत पे सोना याद है हॉ भाई तुम लोगो से ही पूछ रहा हु याद है छत को ठंडी करने के लिए पानी से धोना और उसके बाद बिस्तर छत पे लगा देना ठंडे होने के लिए फिर पापा मा के बीच मैं सोना इस डर से की साइड मैं सोयँगे तो कोई बाबा ले जाएगा .....वो रात को बिस्तर पर सर् रखकर तारो को गिनना भी अपने आप मैं बहुत जिमेदारी का काम था भाई हर किसी के बस की बात नही थी वो ना जाने कितनी अनगिनित रातों के गवाह हम बने है वो शायद अब नही रहा है....रविवार की छूटी होती तो देर तक सोना जब तक सूरज उठा ना दे तब तक उससे बराबर टक्कर लेना....क्रिकेट मैच हो स्कूल टाइम पे तो पेट दर्द का बहाना देश का पहला सुपर हीरो शक्तिमान शनिवार के स्लॉट मैं आता था तो स्कूल से भाग जाना क्या दिन थे चैनल बहुत ही सीमित क्या केवल dd1 था पर फिर भी वो बहुत था....कॉमेंट्री रेडियो पर चलती थी पर फिर भी दिन हसीन थे ....
....... to be continued

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